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निदा फ़ाज़ली का जन्मदिन आज :- रांची में डॉक्टर असलम परवेज की मेहमाननवाजी के कायल थे शायर निदा फ़ाज़ली

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उर्दू के अज़ीम शायर Nida Fazli का जन्‍मदिन आज

आज उर्दू अदब के दुनिया के अलहदा सितारे निदा फाजली की जयंती है। निदा साहब का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ। वो बतौर शायर पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। उनका एक रूप गीतकार का भी रहा है। निदा साहब ने बॉलीवुड फिल्मों में तमाम हिट गाने लिखे जो कि आज तक लोग गुनगुनाते हैं।

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निदा साहब का असली नाम मुक़्तदा हसन था। निदा फाजली उनका पेन नेम है। इसी नाम से निदा साहब को उनके चाहने वाले जानते हैं। उनकी लिखी गजलें और शायरी इसी नाम से मशहूर है। दरअसल निदा का मतलब ‘आवाज़’ होता है। यकीन हो लाखों-करोड़ों लोगों की आवाज थे। फ़ाज़िला क़श्मीर के एक इलाके का नाम है। निदा साहब के पुरखे वहीं से आए थे। लिहाजा उन्होंने अपने नाम में फाजली जोड़ लिया। उनके जयंती पर पढ़िए उनकी लिखी ये दो बेहतरीन गजलें…

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो
जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

रांची के खूबसूरत मौसम के बीच मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली को डॉक्टर असलम परवेज के यहां की मेहमान नवाजी काफी प्रभावित करती थी और शायर निदा फ़ाज़ली को बार-बार रांची आना पसंद का निदा फ़ाज़ली 29 दिसंबर 2005 को अल सफा वेलफेयर सोसाइटी का बैनर तले तस्लीम महल में आयोजित मुशायरे में शिरकत करने के लिए रांची तशरीफ़ लाए थे मुशायरे में निदा साहब की शायरी ने ऐसा समां बांधा कि दिसंबर की सर्द रात में भी भारी संख्या में मौजूद लोगों में गर्मजोशी आ गई लोग उनके हर अल्फाज को सुनते  और सराहाते थे

उसने ग़ज़ल लिखी तो ग़ालिब, नज़्म लिखी तो फैज़ और दोहा लिखा तो कबीर याद आ गए  - Remembering noted lyricist, shayar, poet Nida Fazli on his first death  anniversaryनिदा साहब को रांची बुलाने का श्री डॉक्टर सिद्धि मुजीबी को जाता है का कार्यक्रम से एक रात पहले निदा साहब की तबीयत थोड़ा नाराज हो गई और उन्होंने कार्यक्रम में आने में असमर्थता जता दी लेकिन डॉक्टर मुजीबी किस जीत के आगे झुकते हुए वे रांची आए उन्हें डंडा स्थित होटल युवराज पैलेस में ठहराया गया इस दौरान उस अजीम शख्सियत की बेबाकी और सादगी को करीब से देखने का मौका मिला साहब मुल्क के विभाजन के प्रखर विरोधी और हिंदू मुस्लिम एकता के कट्टर समर्थक थे रांची आगमन पर निदा साहब को झारखंड के राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने जालौर कर सम्मानित भी किया था शायर निदा फ़ाज़ली के साथ राजभवन में डॉक्टर सिद्धीक डॉ सरवर साजिद डॉक्टर असलम परवेज भी मौजूद थे निदा साहब 30 दिसंबर को जब इस शहर से मुंबई रवाना हुए तो उन्हें एयरपोर्ट पर अलविदा कहने के लिए बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे निदा साहब ने रांची एयरपोर्ट पर डॉक्टर असलम प्रवेश की काफी सराहना की और उनकी मेहमान नवाजी से काफी खुश थे और उन्होंने डॉक्टर असलम प्रवेश के हाथ कंधे पर हाथ रखते हुए कहा कि मैं आपके यहां बार बार आना चाहूंगा

डॉक्टर असलम परवेज ने नेशन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा कि आज हम लोग भारत के मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली का जन्मदिन मना रहे हैं और वे जब रांची आए थे तब उनके शायरी से रांची के लोग काफी प्रभावित हुए थे डॉक्टर असलम ने कहा कि उनकी शायरी बार-बार हमें याद आती है, डॉक्टर असलम ने कहा कि रांची कयाम के दौरान मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली का यह शेर अभी मुझे बहुत याद आता है कि

मुमकिन है सफर हो आसान

अब साथ चल कर देख

कुछ तुम भी बदल कर देखो

कुछ हम भी बदल कर देखें

निदा का अर्थ है स्वर/आवाज़/Voice

उर्दू के अज़ीम शायर Nida Fazli का जन्‍मदिन आजउर्दू के अज़ीम शायर और अपने माता-पता की तीसरी संतान Nida Fazli बहुत छोटी उम्र से ही लिखने लगे थे। 12 अक्टूबर 1938 को पैदा हुए Nida Fazli का इंतकाल सन् 2016 में 08 फरवरी के रोज हुआ। Nida Fazli के पिता मुक़्तदा हसन भी शायर थे।
Nida Fazli उनका लेखन का नाम है। निदा का अर्थ है स्वर/आवाज़/Voice। फ़ाज़िला क़श्मीर के एक इलाके का नाम है, जहाँ से निदा के पुरखे आकर दिल्ली में बस गए थे, इसलिए उन्होंने अपने उपनाम में फ़ाज़ली जोड़ लिया।
एक दिन सुबह जब वह किसी मंदिर के पास से गुजर रहे थे तो वहां उन्होंने किसी को सूरदास का भजन… मधुबन तुम क्यौं रहत हरे? बिरह बियोग स्याम सुंदर के ठाढ़े क्यौं न जरे? गाते सुना, जिसमें कृष्ण के मथुरा से द्वारका चले जाने पर उनके वियोग में डूबी राधा और गोपियाँ फुलवारी से पूछ रही होती हैं ऐ फुलवारी, तुम हरी क्यों बनी हुई हो? कृष्ण के वियोग में तुम खड़े-खड़े क्यों नहीं जल गईं? वह सुन कर निदा को लगा कि उनके अंदर दबे हुए दुख की गिरहें खुल रही हैं। फिर उन्होंने कबीरदास, तुलसीदास, बाबा फ़रीद इत्यादि कई अन्य कवियों को भी पढ़ा और पाया कि इन कवियों की सीधी-सादी, बिना लाग लपेट की, दो-टूक भाषा में लिखी रचनाएँ अधिक प्रभावशाली हैं जैसे सूरदास की ही ऊधो, मन न भए दस बीस। एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अराधै ते ईस॥
न कि मिर्ज़ा ग़ालिब की एब्सट्रैक्ट भाषा में “दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है?”।
तब से निदा फ़ाज़ली ने वैसी ही सरल भाषा सदैव के लिए अपना ली।
हिन्दू-मुस्लिम क़ौमी दंगों से तंग आकर उनके माता-पिता पाकिस्तान जा के बस गए लेकिन निदा यहीं भारत में रहे। कमाई की तलाश में कई शहरों में भटके। उस समय बम्बई (मुंबई) हिन्दी/ उर्दू साहित्य का केन्द्र था और वहाँ से धर्मयुग/ सारिका जैसी लोकप्रिय और सम्मानित पत्रिकाएँ छपती थीं। 1964 में निदा काम की तलाश में वहाँ चले गए और धर्मयुग, ब्लिट्ज़ (Blitz) जैसी पत्रिकाओं, समाचार पत्रों के लिए लिखने लगे। उनकी सरल और प्रभावकारी लेखनशैली ने शीघ्र ही उन्हें सम्मान और लोकप्रियता दिलाई। उर्दू कविता का उनका पहला संग्रह 1969 में छपा।
उन्होंने सीधी ज़ुबान के ज़रिए लोगों तक अपने कलाम पहुंचाए। निदा फ़ाज़ली ने न सिर्फ़ ग़ज़लें, नज़्में कहीं बल्कि दोहे भी लिखे। मंच से उन्हें लाखों लोगों ने बोलते सुना तो फ़िल्मों के ज़रिए उनके लिखे गीत भी ख़ूब भाए।

Report By :- KHUSHBOO SHARMA, NEWS DESK, NATION EXPRESS, RANCHI

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