Source: NATION EXPRESS, निदा रहमान, BIHAR
रजिया बिहार में पहली मुस्लिम महिला हैं जो डीएसपी बनेंगी. बीपीएससी से अबतक बिहार की कोई मुस्लिम महिला डायरेक्ट डीएसपी नहीं बनी थी
मुस्लिम महिलाओं के बुर्का, हिजाब, पर्दा पर सालों से चलने वाली इस बहस का कोई नतीजा नहीं निकला है. ना इसका नतीजा निकलने वाला है. सोशल मीडिया पर एक बार फिर पर्दा, नकाब और मुस्लिम महिलाओं को कैसे कपड़े पहनने चाहिए इस पर बहस चल रही है. कुछ महिलाओं को पर्दे पर सवाल उठाने के बाद गंदे तरीके से ट्रोल किया गया है. उनका चरित्र हनन तक किया गया.
- Advertisement -

धर्मांधों की एक भीड़ ट्रोल की शक्ल में टूट पड़ती है सवाल उठाने वाली महिलाओं पर. नारीवाद को लेकर भी एक लंबी बहस चलती है कि आखिर नारीवाद है क्या. इसी बहस के बीच बिहार पब्लिक सर्विस का नतीजा आता है जिसमें एक नाम सभी को चौकाता है. वो नाम है रज़िया सुल्तान. रज़िया डीएसपी पद के लिए चयनित हुई हैं. रजिया बिहार में पहली मुस्लिम महिला हैं जो डीएसपी बनेंगी. बीपीएससी से अबतक बिहार की कोई मुस्लिम महिला डायरेक्ट डीएसपी नहीं बनी थी.

सवाल ये है कि सोशल की मुस्लिम महिलाओं को लेकर होने वाली तमाम बहसें पर्दे पर सिमट जाती हैं. जबकि बहस मुस्लिम महिलाओं की एजुकेशन पर करनी चाहिए. उन्हें पढ़ने दें. वो फिर तय कर लेंगी की उन्हें हिजाब में रहना है या वर्दी में. पर्दे की बहस अनंतकाल काल से चली आ रही है . मुस्लिम चाहें तो DSP बनी लड़की से सबक लें अपनी बहन बेटियों को पैरों पर खड़ी होने दें. फिर देखें कैसे वो अपने सपनों में रंग भर्ती हैं. कैसे वो अपना आसमान खुद हासिल करती हैं.

लड़कियां पैदा होते ही संघर्ष करती हैं. मुस्लिम समाज में वैसे ही शिक्षा का प्रतिशत कम है और बात जब महिला शिक्षा की आती है तो हम सदियो पीछे चल जाते हैं. अच्छा खाने, अच्छा पहनने से ज़्यादा ज़रूरी है कि हम अच्छी शिक्षा हासिल करें. शिक्षा सिर्फ़ नौकरी हासिल करने के लिए नहीं की जाती है, पढ़ाई से नज़रिया पैदा होता है, अच्छी बुरी की समझ आती है.

चार साल के बाद बिहार लोक सेवा आयोग की 64वीं संयुक्त परीक्षा का फाइनल रिजल्ट में मुस्लिम अभ्यार्थियों ने सात प्रतिशत के करीब कामयाबी हासिल की है जो पिछली बार के प्रतिशत से कहीं ज़्यादा है. बीपीएससी के इस रिजल्ट से मुस्लिम समाज को कई अधिकारियों के साथ चार डीएसपी भी मिले हैं जिसमें रज़िया सुलतान भी हैं.मुसलमानों को अब सोचना चाहिए कि उन्हें क्या हासिल करना है वो सलमान के फ़ैन बने रहना चाहते हैं या खुद यूथ आइकॉन बनना चाहते हैं. अच्छा पहनना अच्छा खाना, महंगी बाइक इस सब से आप आज की दुनिया का सामना नहीं कर सकते हैं, आज के माहौल से मुकाबला करना है तो दीनी तालीम के साथ दुनियावी तालीम भी हासिल करनी होगी. बेटी के पैदा होने के बाद उसके लिए दहेज की चिंता ना करिए बल्कि उसकी पढ़ाई की फिक्र करें. उसे अच्छी तालीम दें ताकि उसका भविष्य सुरक्षित रहे.
पढ़ाई आपको विकास की तरफ़ ले जाएगी, विकास से ही बेहतर ज़िंदगी हासिल होगी. सोशल मीडिया पर लगातार पर्दे को लेकर बहस चलती है जबकि असल बहस एज्युकेशन पर होनी चाहिए कि कितना प्रतिशत है मुस्लिम महिलाओं में पढ़ाई का. उनकी पढ़ाई स्तर क्या है. पढ़ाई सिर्फ़ अच्छी जगह शादी होने के लिए ना कराई जाए.
ज़्यादातर मां बाप लड़कियों को उतना पढ़ाना ज़रूरी समझते हैं जितने में शादी आसानी से हो जाए. लड़कियां पढ़ जाएं तो उन्हें नौकरी करने की आज़ादी नहीं होती है. हम आज़ादी की बात करते हैं तो आज़ादी रात में घूमना नहीं है, सिगरेट शराब पीना भी नहीं है. हमारे लिए आज़ादी का मतलब सोचने समझने की आज़ादी है.

बोलने की आज़ादी है, फ़ैसले लेने देने की आज़ादी है, अपनी ज़िंदगी का फ़ैसला खुद लेने देने की आज़ादी है. रज़िया ऐसे ही आज़ादी की मिसाल हैं, उनके माता पिता ने उसे फैसला लेने की आज़ादी दी है. आज बिहार नहीं बल्कि पूरा मुस्लिम समुदाय अपनी बेटी की कामयाबी के लिए खुश है. लेकिन रज़िया इकलौती नहीं हैं रज़िया जैसे हज़ारों रज़िया घरों से निकल सकती हैं उन्हें हिम्मत दीजिए हौसला दीजिए और सबसे पहले उन्हें आज़ादी दीजिए ये तय करने की उन्हें क्या करना है. वो एक मुकाम पर पहुंच जाएंगी फिर खुद तय कर लेंगी कि उन्हें बुर्का पहनना है या वर्दी.
Source: NATION EXPRESS, निदा रहमान, BIHAR
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए NATION EXPRESS किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)