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देश में कॉमन सिविल कोड की दस्तक : हमेशा के लिए खत्म होगा मुस्लिम पर्सनल लॉ : जल्द लागू हो सकता है कॉमन सिविल कोड, क्या है कॉमन सिविल कोड ? इससे क्या है फायदा? क्या है नुकसान ? इसे जरूर पढ़ें और समझने की कोशिश करें

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NEWS DESK, NATION EXPRESS, NEWS DELHI

कॉमन सिविल कोड क्या है? जो CAA, राम मंदिर, अनुच्छेद 370 के बाद बीजेपी का प्रमुख एजेंडा है !

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देश से मुस्लिम, ईसाई और पारसी धर्म का पर्सनल लॉ हो सकता है हमेशा के लिए खत्म

 हिंदू सिविल लॉ के तहत हिंदू, सिख, जैन और बौध आते हैं। कुल मिलाकर देश में अलग- अलग सिविल (Common Civil Code) कानून है। इसी को लेकर सरकार कॉमन सिविल कोड लागू करना चाहती है ताकि देश में एक नागरिक एक कानून रहे।

समान नागरिक संहिता पूरे देश के लिये एक समान कानून के साथ ही सभी धार्मिक समुदायों के लिये विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने आदि कानूनों में भी एक जैसी स्थिति प्रदान करती है. इसका पालन धर्म से परे सभी के लिए जरूरी होता है.

Common Civil Code : इन दिनों देश में कॉमन सिविल कोड (Common Civil Code) को लेकर चर्चा का माहौल है केंन्द्र की मोदी सरकार देशभर में जल्द ही कॉमन सिविल कोड (Common Civil Code) लागू कर सकती है।  केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कॉमन सिविल कोड (Common Civil Code) यानी समान नागरिक संहिता लागू करने के संकेत भी दिए थे। शाह ने कहा था कि सीएए, राममंदिर, धारा- 370 और ट्रिपल तलाक के बाद अब कॉमन सिविल कोड (Common Civil Code) की बारी है। उत्तराखंड में कॉमन सिविल कोड पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू किया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठाता है कि आखिर केन्द्र सरकार कॉमन सिविल कोड (Common Civil Code) क्यों लागू करना चाहती है? आखिर क्या है कॉमन सिविल कोड़ ?

 

Uniform Civil Code in India: समान नागरिक संहिता और भारत में इसकी जरूरत, जानिए विस्तार सेक्या है कॉमन सिविल कोड?

कॉमन सिविल कोड (Common Civil Code) को हिंदी में समान नागरिक संहिता कहते है। यह एक पंथनिरपेक्ष कानून है जो सभी पंथों के लिए समान रूप से होता है। समान नागरिकता संहिता का मतलब होता है भारत में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून, इसमें कोई जाति नही होती है। इस कानून के लागू होने के बाद हर वर्ग के लिए एक कानून होगा। फिलहाल अभी प्रत्येक धर्म के लोगों के मामले पर्सनल लॉ के माध्यम से निपटाए जाते हैं। जैसे कि शादी, तलाक, जायदाद का बंटवारा और बच्चों को गोद लेने के मामले पर्सनल लॉ के हिसाब उनका फैसला होता है। देश में मुस्लिम, ईसाई और पारसी धर्म का पर्सनल लॉ है, तो वही हिंदू सिविल लॉ के तहत हिंदू, सिख, जैन और बौध आते हैं। कुल मिलाकर देश में अलग- अलग सिविल (Common Civil Code) कानून है। इसी को लेकर सरकार कॉमन सिविल कोड लागू करना चाहती है ताकि देश में एक नागरिक एक कानून रहे।

जितना आप जानते हैं, उससे कहीं ज्यादा है यूनिफॉर्म सिविल कोड - know about uniform civil code beyond politics - AajTakक्या होगा इससे फायदा

समान नागरिक संहिता को लागू होने पर न्यायपालिका में लंबित मामले आसानी से सुलझाए जा सकते है। शादी, तलाक, गोद लेना और जायदाद के बंटवारे जैसे मामले  ही कानून के दायरे में आएंगे जिनका फैसला करने में समय नहीं लगेगा। न्यायपालिका का समय बचेगा। फिलहाल अभी सभी मजहब इन मामलों का बंटवारा अपने कानून के मुताबिक करते हैं। अमेरिका, पाकिस्तान, तुर्की, आयरलैंड, बांग्लादेश समेत दुनियाभर के कई देशों में कॉमन सिविल कोड (Common Civil Code) लागू है। लेकिन भारत में यह कानून लागू नहीं है। माना जा रहा है कि केन्द्र सरकार जल्द ही भारत में कॉमन सिविल कोड (Common Civil Code) लागू कर सकता है।

क्या संविधान में इसका प्रावधान है
हां, संविधान के अनुच्छेद 44 कहता है कि शासन भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिये एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की कोशिश करेगा. अनुच्छेद-44 संविधान में वर्णित राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों में एक है. यानि कोई भी राज्य अगर चाहे तो इसको लागू कर सकता है. संविधान उसको इसकी इजाजत देता है. अनुच्छेद-37 में परिभाषित है कि राज्य के नीति निदेशक प्रावधानों को कोर्ट में बदला नहीं जा सकता लेकिन इसमें जो व्यवस्था की जाएगी वो सुशासन व्यवस्था की प्रवृत्ति के अनुकूल होने चाहिए.

देश में समान नागरिक संहिता क्या लागू है
देश में ये कानून कुछ मामलों में लागू है लेकिन कुछ में नहीं. भारतीय अनुबंध अधिनियम, नागरिक प्रक्रिया संहिता, माल बिक्री अधिनियम, संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, भागीदारी अधिनियम, साक्ष्य अधिनियम आदि में समान नागरिक संहिता लागू है लेकिन विवाह, तलाक और विरासत जैसी बातों में इसका निर्धारण पर्सनल लॉ या धार्मिक संहिता के आधार पर करने का प्रावधान है.

demand for uniform civil code arose in madhya pradesh | uniform civil code : समान नागरिक संहिता को लेकर घमासान, कांग्रेस और भाजपा में जुबानी जंग | Patrika Newsये कानून भारत में कब पहली बार आया
समान नागरिक संहिता की शुरुआत ब्रितानी राज के तहत भारत में हुई थी, जब ब्रिटिश सरकार ने वर्ष 1835 में अपनी रिपोर्ट में अपराधों, सबूतों और अनुबंधों जैसे विभिन्न विषयों पर भारतीय कानून की संहिता में एकरूपता लाने की जरूरत की बात कही थी. हालांकि इस रिपोर्ट ने तब हिंदू और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों को इससे बाहर रखने की सिफारिश की थी.

फिलहाल क्या स्थिति है
ब्रिटिश शासन में जो व्यवस्था थी, उसमें बदलाव किया जा चुका है. वर्ष 1941 में हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने के लिये बी.एन. राव समिति का गठन किया गया. जिसकी सिफारिशों के आधार पर हिंदुओं, बौद्धों, जैनों और सिखों के लिए उत्तराधिकार, संपत्ति और तलाक से संबंधित कानून को संशोधित करके वर्ष 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तौर पर नया कानून बनाया गया. हालांकि मुस्लिम, इसाई और पारसी धर्म के लोगों के लिए अलग व्यक्तिगत कानून बरकरार रहे.

Report By :-  MADHURI SINGH / AFSHA ANJUM, NEWS DESK, NATION EXPRESS, NEWS DELHI

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