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दिल्ली दंगा मामले में आसिफ, नताशा और देवांगना को तत्काल रिहा करने का आदेश

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NEWS DESK, NATION EXPRESS, NEW DELHI

दिल्ली दंगा मामले में जमानत पा चुके छात्र आसिफ, नताशा और देवांगना को तत्काल रिहा करने के लिए निचली अदालत ने आदेश दे दिया है। दरअसल तीनों आरोपियों ने बुधवार को निचली अदालत में रिहाई के लिए अपील की थी जिस पर अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था और आज उस पर सुनवाई हुई।

इससे पहले गुरुवार सुबह इन तीनों छात्रों ने अपनी तत्काल रिहाई की मांग के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था। अदालत ने इस मामले में छात्रों के वकील को निचली अदालत में जाने को कहा था। फिर साढ़े तीन बजे दोबारा मामले की सुनवाई करने वाली थी। दरअसल हाईकोर्ट ने इन्हें 15 जून को ही जमानत दे दी थी लेकिन दिल्ली पुलिस ने पेपर वर्क के लिए अधिक समय मांगा था जिसके चलते ये तीनों अभी तक रिहा नहीं हो सके हैं।

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तीनों छात्रों को जमानत के फैसले को पुलिस ने दी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
Delhi Riots 2020 Court Orders Early Release Of Asif Natasha Devanga -  दिल्ली हिंसा: हाईकोर्ट के बाद अब दिल्ली कोर्ट का आदेश, आसिफ, नताशा और  देबांगना को करो तत्काल रिहा ...दिल्ली पुलिस ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत दिल्ली दंगों के एक मामले में आसिफ इकबाल तन्हा, देवांगना कलिता और नताशा नरवाल को जमानत देने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की है। याचिका में पुलिस ने हाईकोर्ट द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए कहा, तीन अलग-अलग जमानत फैसले बिना किसी आधार के थे और चार्जशीट में एकत्रित और विस्तृत सबूतों की तुलना में सोशल मीडिया कथा पर आधारित प्रतीत होते हैं।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि प्रथम दृष्टया जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र आसिफ इकबाल तन्हा और जेएनयू के दो स्कॉलर देवांगना कलिता और नताशा नरवाल पर यूएपीए की धारा-15, 17 और 18 के तहत अपराध नहीं बनता है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने तीनों को जमानत देते हुए अपने फैसले में कहा था कि विरोध करना सांविधानिक अधिकार है और इसे यूएपीए कानून के तहत आतंकी गतिविधि नहीं कहा जा सकता है। हाईकोर्ट का कहना था कि यूएपीए कानून के तहत आतंकी गतिविधि की परिभाषा स्पष्ट नहीं है। इसे लापरवाही से लागू नहीं किया जा सकता।

एक बार फिर टली दिल्ली दंगों के आरोपी तीन कार्यकर्ताओं की रिहाईहाईकोर्ट का कहना था कि इसमें कोई बहस नहीं है कि इन्होंने सीएए के खिलाफ होने वाले प्रदर्शन में हिस्सा लिया लेकिन विरोध का अधिकार मूल अधिकार है। अपनी अपील में दिल्ली पुलिस ने कहा, हाईकोर्ट ने न केवल एक ‘मिनी-ट्रायल’ किया है बल्कि हाईकोर्ट ने जो निष्कर्ष दर्ज किए हैं जो रिकॉर्ड और मामले की सुनवाई के दौरान की गई दलीलों के विपरीत हैं।

हाईकोर्ट ने पूर्व-कल्पित तरीके से इस मामले का निपटारा किया और यह पूरी तरह से गलत फैसला है। हाईकोर्ट ने मामले का इस तरह से निपटारा किया जैसे कि छात्रों द्वारा विरोध का एक सरल मामला हो। नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध के बाद फरवरी, 2020 में शुरू हुए दंगों में 53 लोगों की जान चली गई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे।

तीनों एक साल से अधिक समय से जेल में थे। पुलिस ने तर्क दिया है कि हाईकोर्ट का विचार है कि यूएपीए के प्रावधानों को केवल ‘भारत की रक्षा’ पर गहरा प्रभाव वाले मामलों से निपटने के लिए लागू किया जा सकता है, न ही अधिक और न ही कम। पुलिस का कहना है कि हाईकोर्ट का यह मानना गलत है कि वर्तमान मामला असंतोष को दबाने के लिए था।

Report By :- ANUJA AWASTHI, NEWS DESK, NATION EXPRESS, NEW DELHI

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