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इल्मा की आखिरी ख्वाहिश रह गई अधूरी ! मस्जिद-दरगाह में शव के साथ की गई बदसलुकी …. बिना जनाजे की नमाज के दफ्न हुई मोहब्बत

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CITY DESK, NATION EXPRESS, बरेली 

बरेली में इल्मा ने हिंदू रीति-रिवाज से प्रेम विवाह किया था, लेकिन उसकी आखिरी ख्वाहिश थी कि उसे इस्लामी रवायत के मुताबिक दफनाया जाए। इल्मा की मौत के बाद उलमा ने जनाजे की नमाज पढ़ाने से मना कर दिया, जिससे उसकी ख्वाहिश अधूरी रह गई।

इल्मा की मौत पर कट्टरपंथियों ने नहीं पढ़ी नमाज-ए-जनाजा:हिंदू युवक से लव मैरिज करने पर कट्टरपंथियों ने युवती के खिलाफ जारी किया था फतवा

कहते हैं धर्म प्रेम देना और करना सिखाता है, लेकिन उसी धर्म की आड़ में कैसे प्रेम करने वालों को ‘सजा’ दी जाती है, इसका ताजा केस बरेली में देखने को मिला. इस केस में एक ओर प्रेम है और प्रेम के लिए सब कुछ कर गुजरने का जज्बा है, तो दूसरी ओर उसी प्रेम के खिलाफ कट्टरता का चरम भी है. ये केस बरेली के थाना किला क्षेत्र स्थित जखीरा मोहल्ला का है. यहां एक मुस्लिम युवती ने दो साल पहले हिंदू धर्म के एक युवक से लव मैरिज की थी. बीते रविवार को उस लड़की की बीमारी से मौत हो गई. मौत के बाद युवती के जनाजे की नमाज और उसे दफन की प्रक्रिया को लेकर विवाद खड़ा हो गया. आरोप है कि कट्टरपंथी मुस्लिम धर्मगुरुओं ने जनाजे की नमाज पढ़ने से इनकार कर दिया और मस्जिद का खटोला भी देने से मना कर दिया. पुलिस के हस्तक्षेप के बाद युवती को किसी तरह कब्रिस्तान में दफन किया गया.

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ये निकाह के वक्त की इल्मा की फोटो है। - Dainik Bhaskar

बेबस पिता का छलका दर्द…मौलानाओं ने मरने के बाद भी मेरी बेटी को नहीं ‘छोड़ा’

‘मेरी बेटी ने इतना बड़ा गुनाह नहीं किया था कि उसके शव की भी बेइज्जती की जाए। मेरी बेटी ने एक हिंदू से लव मैरिज की। उसकी ससुराल वाले बहुत अच्छे थे। हमारे दामाद ने कभी उस पर दबाव नहीं डाला कि वह धर्म परिवर्तन करे। मेरे दामाद मेरी बेटी को बहुत प्यार करते थे, लेकिन जब मेरी बेटी की मौत हो गई, तो हमारे ही धर्म के कट्टरपंथियों ने मेरी बेटी की नमाज-ए-जनाजा तक पढ़वाने से इनकार कर दिया।’

यह दर्द भरी दास्तान है बरेली की इल्मा की, जो अब इस दुनिया में नहीं रही। इल्मा की मां रोते हुए कहती हैं कि जब मेरी बेटी इस दुनिया में थी, तब भी धर्म के ठेकेदारों ने उसका बहिष्कार कर दिया। और जब उसकी मौत हो गई, तब भी उसका बहिष्कार किया गया। इल्मा के पिता कई मस्जिदों में गए और वहां खटोला और नमाज-ए-जनाजा के लिए इमामों से गुहार लगाई, लेकिन कोई भी तैयार नहीं हुआ। सबने उन्हें दुत्कार कर भगा दिया। जब कहीं से कोई सहायता नहीं मिली, तो वे खुद बाजार से खटोला खरीद लाए और पुलिस की मदद से बिना नमाज-ए-जनाजा पढ़वाए ही उसे कब्रिस्तान में दफना दिया।

Ilma wish remained unfulfilled after death she was buried without offering Namaaz-e-Janazaबेटी की आखिरी इच्छा भी पूरी न कर सके पिता

इल्मा के पिता ने बताया कि उनकी बेटी की आखिरी इच्छा थी कि उसका अंतिम संस्कार इस्लामिक रीति-रिवाजों से किया जाए। लेकिन मैं अपनी बेटी की आखिरी ख्वाहिश भी पूरी नहीं कर सका। वे कहते हैं। अब उन्हें डर है कि जो लोग खुद को इस्लाम धर्म का रहनुमा बताते हैं, वे उनका भी बहिष्कार न कर दें। उन्हें यह भी आशंका है कि कहीं उनकी बेटी का शव कब्र से निकलवा कर फिंकवा न दिया जाए।

अब जानिए पूरी कहानी

दरअसल, किला के जखीरा मोहल्ले की रहने वाली इल्मा को शाहबाद निवासी एक हिंदू युवक से मोहब्बत हो गई थी। इसके बाद दोनों ने शादी करने का फैसला किया और 16 जनवरी 2022 को शादी कर ली। इल्मा के पिता ने बताया कि उन्होंने मुस्लिम रीति-रिवाज से अपनी बेटी का निकाह कराया था। मौलवी ने निकाह पढ़वाया था और शादी में काफी लोग शामिल हुए थे। इल्मा की मौत 1 जून को हुई। इल्मा की मां ने बताया कि वह लंबे समय से बीमार चल रही थी। उसे लूज मोशन हो रहे थे, जिस कारण उसकी मौत हो गई। उसके सुपुर्द-ए-खाक में उसकी ससुराल वाले सभी लोग शामिल हुए। सभी का रो-रोकर बुरा हाल था।

ये इल्मा की मां है।शादी के बाद भी इल्मा ने नहीं छोड़ा था इस्लाम

इल्मा और राहुल एक-दूसरे से बहुत मोहब्बत करते थे। इल्मा ने कभी इस्लाम नहीं छोड़ा। वह राहुल के साथ रहते हुए भी पांच वक्त की नमाज़ पढ़ती थी और रोजे रखती थी। उसके ससुराल वालों को उससे कोई परेशानी नहीं थी। उन्होंने कभी भी इल्मा से धर्म परिवर्तन के लिए नहीं कहा।

एक ही घर में रहकर दोनों अपनाते थे अपने-अपने धर्म

राहुल के घर पर रोज सुबह आरती होती है। वे लोग होली, दिवाली जैसे त्योहार एक साथ मनाते हैं। लेकिन उसी घर में ईद भी धूमधाम से मनाई जाती है। इल्मा सभी के लिए मीठी सेवई बनाती थी, जो सबको बेहद पसंद थी।

इल्मा की आख़िरी ख्वाहिश को भी समाज ने ठुकराया! मस्जिद-दरगाह से निकाला, बिना जनाजे की नमाज़ कब्र में सुला दी गई मोहब्बतदरगाह में भी हुई बेइज़्ज़ती, उलमा ने नकारा

मस्जिद से मना किए जाने के बाद उम्मीद की एक किरण लेकर परिजन जनाजा लेकर दरगाह पहुंचे। लेकिन वहां भी झटका मिला। दरगाह के मुफ्ती खुर्शीद आलम ने साफ कहा कि इल्मा ने “हिंदू रीति-रिवाज” से शादी की थी, इसलिए वह इस्लामी दायरे में नहीं है। इस वजह से उसके लिए नमाज-ए-जनाजा पढ़ना गैर-इस्लामी होगा।

पुलिस की मदद से दफ्न किया गया शव

इल्मा के परिजन उसे आखिरकार जनाजे की नमाज के बिना ही बाकरगंज कब्रिस्तान ले गए. वहां भी कुछ लोगों ने विरोध किया और शव को दफनाने से रोकने की कोशिश की. इस पर पुलिस को बुलाना पड़ा. पुलिस ने हस्तक्षेप कर माहौल शांत कराया और उसके बाद इल्मा को कब्रिस्तान में दफ्न किया गया. इल्मा के अंतिम सफर में उसका पति राहुल और अन्य ससुराल वाले भी शामिल रहे. उन्होंने भी इल्मा की ख्वाहिश के मुताबिक उसे इस्लामी तरीके से विदा करने की कोशिश की, लेकिन मजहबी बंदिशें आड़े आ गईं.

मुफ्ती ने क्यों किया इनकार?

इल्मा ने निकाह किया था लेकिन दरगाह के मुफ्ती खुर्शीद आलम का कहना है कि इल्मा ने हिंदू रीति-रिवाज से शादी की थी. इसलिए वह इस्लामी नजरिए से बाहर हो गई थी. इसलिए उसकी जनाजे की नमाज पढ़ाना जायज नहीं है. उन्होंने कहा कि इस्लाम के मुताबिक किसी गैर-मुस्लिम के लिए नमाज-ए-जनाजा नहीं पढ़ी जाती.

बिना ज़नाजे की नमाज़ के दफ्न कर दी गई मुस्लिम लड़की की ला'श, वज़ह कर देगी हैरान....#upnews #viralvideoबरेली में पहला ऐसा मामला

स्थानीय लोगों का कहना है कि बरेली में यह अपनी तरह का पहला मामला है, जब किसी मुस्लिम महिला की गैर-मुस्लिम युवक से शादी के बाद मौत पर जनाजे की नमाज नहीं पढ़ी गई और बगैर मजहबी रस्मों के उसे दफनाया गया. यह घटना समाज में कई सवाल खड़े कर रही है और चर्चा का विषय बनी हुई है.

आखिरी सफर में पति राहुल और ससुरालवाले भी थे शामिल

इल्मा के अंतिम सफर में उसका पति राहुल और ससुराल वाले भी साथ थे। उन्होंने उसकी आखिरी ख्वाहिश पूरी करने की पूरी कोशिश की, लेकिन मजहबी बंदिशों ने इंसानियत पर एक और सवाल खड़ा कर दिया। उन्हें उम्मीद थी कि समाज मोहब्बत को मजहब से ऊपर रखेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

The fundamentalists did not offer Namaaz-e-Janaza on the death of Ilma | इल्मा की मौत पर कट्टरपंथियों ने नहीं पढ़ा नमाज-ए-जनाजा: हिंदू युवक से लव मैरिज करने पर कट्टरपंथियों ...क्या अब मोहब्बत की भी मजहबी कीमत चुकानी होगी?

इल्मा की मौत एक सवाल छोड़ गई है—क्या अब मोहब्बत की भी मजहबी कीमत चुकानी पड़ेगी? क्या एक महिला को इसलिए आखिरी इज्ज़त से वंचित कर दिया गया क्योंकि उसने दिल की सुनी थी? समाज इस पर मौन है, लेकिन बरेली की मिट्टी में दफ्न इल्मा की अधूरी ख्वाहिश अब इंसाफ मांग रही है।

CITY DESK, NATION EXPRESS, बरेली 

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