UP चुनाव से पहले मोदी का ‘मास्टर स्ट्रोक, PM ने यूपी के 5 दौरे किए, फिर भांपा मिजाज, 210 सीटों पर किसान हैं निर्णायक, तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का कर दिया एलान, झारखंड के नेताओं में भी खुशी की लहर
NEWS DESK, NATION EXPRESS, लखनऊ
एक माह में कब-कब यूपी आए पीएम मोदी
सरकार को झुकाने वाली टिकैत के आंसू, सड़क पर संसद और करनाल में पुलिस लाठीचार्ज; ऐसे तय हुआ कृषि कानूनों की वापसी का रास्ता
21 अक्टूबर: कुशीनगर 25 अक्टूबर: सिद्धार्थनगर 25 अक्टूबर: वाराणसी 15 नवंबर: सुल्तानपुर 19 नवंबर: महोबा, झांसी, लखनऊ
नया मोर्चा: कृषि कानून वापस होने के बाद भी आंदोलन खत्म होने के आसार नहीं, अब एलान और भरोसे पर सियासत
गुरु नानक जयंती की सुबह सूरज निकला तो हर कोई भक्तिभाव में सराबोर नजर आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस विशेष दिन को और खास बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने सालभर से चली आ रही किसानों की नाराजगी को दूर करने की कोशिश की और अन्नदाताओं को हुई दिक्कतों पर क्षमा मांगते हुए तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का एलान कर दिया। किसान संगठनों ने इस फैसले का स्वागत तो किया, लेकिन किसान नेता राकेश टिकैत ने अलग ही राग अलापा। उन्होंने पहले तो संसद में कृषि कानूनों के वापस होने तक आंदोलन खत्म नहीं करने की बात कही। इसके बाद एमएसपी समेत किसानों की अन्य मांगों का मसला भी उठा दिया। अब सवाल यह उठता है कि पीएम मोदी के एलान के बाद भी क्या किसान आंदोलन खत्म नहीं होगा? क्या यह पीएम मोदी का मास्टरस्ट्रोक साबित होगा? क्या पीएम के एलान और किसानों के भरोसे के बीच अब सियासी दांव-पेच चले जाएंगे?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूपी चुनाव से महज तीन महीने पहले बड़ा मास्टर स्ट्रोक खेला है। उन्होंने यह निर्णय लेने से पहले एक महीने में यूपी के 5 दौरे किए। इसके जरिए यूपी की जनता का मिजाज पढ़ा। फिर जिन तीन नए कृषि कानूनों को लेकर 12 महीने से किसान पूरे देश में आंदोलित थे, उन्हें वापस ले लिया। यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से करीब 210 सीटों पर किसान ही जीत-हार का फैसला करते हैं। इसलिए भाजपा चुनावों तक किसानों को नाराज नहीं करना चाहती थी। अब इस फैसले का आगामी विधानसभा चुनाव पर असर पड़ना भी निश्चित लग रहा है। आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र गाजीपुर बॉर्डर रहा, जहां मुजफ्फरनगर के किसान नेता राकेश टिकैत अपना टेंट लगाकर बैठे थे। आंदोलन का असर पश्चिमी यूपी से निकलकर सेंट्रल यूपी तक पहुंच रहा था। विपक्ष भी सरकार को घेर रही थी। जहां-जहां किसान महापंचायत कर रहे थे, नेता भी पहुंच रहे थे।
- Advertisement -
तीन कृषि काला कानून वापस किसान आंदोलन की जीत :- मनोज कुमार पाण्डेय, राजद
केंद्र सरकार द्वारा किसान आंदोलन एवं कई किसानों के शहीद होने के उपरांत मोदी सरकार की नींद खुली और आज खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी इनके जन्मदिन पर आंदोलन के सामने आखिरकार नतमस्तक होते हुए तीन कृषि काला कानून वापस लिया! प्रदेश राजद के पूर्व प्रदेश महासचिव स प्रवक्ता मनोज कुमार पांडेय ने कृषि कानून वापसी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि केंद्र सरकार की हठधर्मिता के चलते देश के कई किसान आंदोलन में शहीद हो गए ,करोड़ों का कृषि से संबंधित व्यापार नुकसान हुआ ,आंदोलन में किसानों द्वारा की उपजाऊव फसलों का भी नुकसान हुआ ,तब जाकर केंद्र सरकार की आंख खुली और यह तीन कृषि काला कानून वापस लिया जोकि किसानों के आंदोलन की जीत है!
भाजपा के खिलाफ इस कदर गुस्सा बढ़ रहा था कि नेताओं को गांवों में घुसने तक नहीं दिया जा रहा था। यह माहौल विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए बहुत महंगा पड़ने वाला था। लेकिन प्रधानमंत्री ने एक ही दांव में विपक्ष को चित कर दिया है।
4 पॉइंट में समझिए मोदी ने कैसे किया विपक्ष को चारों खाने चित
विपक्ष के हाथ से छीना बड़ा मुद्दा
किसान आंदोलन को लेकर यूपी में भाजपा सरकार पर सबसे अधिक हमलावर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी रहीं। प्रियंका के अलावा सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, आप पार्टी सांसद संजय सिंह ने लखीमपुर हिंसा में मृतक किसानों के परिजनों से मुलाकात भी की थी। हिंसा के आरोपी आशीष की गिरफ्तारी और मंत्री अजय मिश्रा टेनी की बर्खास्तगी का मुद्दा छेड़ दिया था। इससे सरकार चौतरफा घिर रही थी। लेकिन मोदी ने विपक्ष के हाथ से बड़ा मुद्दा छीन लिया है।
कृषि कानून वापस लिए जाना सराहनीय एवं स्वागत योग्य: जितेंद्र महतो
लोहरदगा: भाजपा किसान मोर्चा लोहरदगा जिला अध्यक्ष जितेंद्र महतो ने एक प्रेस बयान जारी कर भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कृषि कानून वापस लिए जाने को सराहनीय एवं स्वागत योग्य कदम बताया। भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा जिला अध्यक्ष श्री महतो ने कहा कि प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री श्री मोदी जी द्वारा किसानों के हित में तीनों बेहतरीन कानून बनाए, मगर कुछ विपक्षी स्वार्थी नेताओं द्वारा किसानों को गोलबंद कर इसका पुरजोर विरोध किया गया। जिसके चलते देश में अराजकता का माहौल बनाया गया। सड़कों पर उत्पात मचाते हुए महीनों तक रास्ता जाम किया गया। विपक्षियों द्वारा इस मुद्दे को उछाल कर सरकार की छवि को किसान विरोधी बनाने का प्रयास किया जा रहा था। उन्होंने कहा कि केंद्र में किसानों द्वारा ही चुनी गयी फुल बहुमत की सरकार है। हालांकि तीनों कृषि कानून किसानों के हितों के मद्देनजर बनायी गयी है। बहरहाल अच्छा हो या बुरा, उनके अनुरूप ही कार्य होनी चाहिए, जिससे पूरे देश के किसान खुश रहे।
सपा-रालोद के गठबंधन पर दिखेगा असर
पश्चिमी यूपी में राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी का कद किसान आंदोलनों के चलते बढ़ रहा था। यूपी विधानसभा चुनाव में जयंत चौधरी का सपा से गठबंधन होना है। बात बन गई है, लेकिन अभी इसका ऐलान नहीं हुआ है। यदि किसान आंदोलन ऐसे ही चलते रहते तो चुनाव में सीधा लाभ सपा-रालोद को मिलता। अब मोदी सरकार के रुख के बाद क्या असर दिखेगा, यह समय बताएगा।
एक दांव में जाटलैंड को साधा
यूपी और केंद्र में भाजपा को सत्ता दिलाने में जाट समुदाय का बड़ा हाथ था। पहले 2014 लोकसभा, फिर 2017 विधानसभा और 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा को पश्चिमी यूपी के जाट समुदाय का खुलकर समर्थन मिला। यहां 12% जाट, 32% मुस्लिम, 18% दलित, अन्य ओबीसी 30% हैं। किसान आंदोलनों के कारण इस बार भाजपा के लिए राह आसान नहीं थी। बागपत और मुजफ्फरनगर जाटों का गढ़ है। मुजफ्फरनगर की सिसौली, एक तरह से भारतीय किसान यूनियन की राजधानी है और बागपत का छपरौली रालोद का गढ़ है।
किसान 2022 के चुनाव में भाजपा को सबक सिखाने के लिए तैयार बैठा था। अब कृषि कानूनों की वापसी से भाजपा डैमेज कंट्रोल में कामयाब हो सकती है। अगर 12% नाराज जाट भाजपा के साथ वापस आते हैं तो तस्वीर बदल जाएगी।
अभिमानी केन्द्र सरकार को अन्नदाताओं के सामने झुकना पड़ा: डॉ रामेश्वर
झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष और राज्य के वित्त तथा खाद्य आपूर्ति मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव ने तीन नये कृषि कानून को निरस्त किये जाने की घोषणा का स्वागत करते हुए कहा यह किसानों की बड़ी जीत है। अभिमानी केन्द्र सरकार को अन्नदाताओं के सामने झुकना पड़ा।डेमोक्रेसी में कोई कानून जबरन थोपा नहीं जाता है। कानून बनाने के पहले लोगों से विचार-विमर्श और उनका सुझाव लिया जाता है जिनके लिए कानून बन रहा है। उनसे पूछा जाता है कि यह उनके हित में है या नहीं, लेकिन बीजेपी ने एकतरफा फैसला ले लिया और तीन नये कृषि कानून को संसद से पारित कराने का काम किया। इस मौके पर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के डेलिगेट्स आलोक कुमार दूबे ने कहा कि एक वर्ष तक कृषि कानून के खिलाफ चल रहे आंदोलन में पार्टी उनके साथ खड़ी रही। भाजपा नेताओं और केंद्र सरकार ने मंत्रियों ने किसान आंदोलन को कभी खालिस्तान समर्थक, तो कभी आतंकियों का आंदोलन बताते की कोशिश, परंतु लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन जारी रहा। इस आंदोलन में आज एक बड़ी सफलता मिली है, लेकिन जब तक लोकसभा से इसे संवैधानिक तरीके से वापस नहीं ले ले लिया जाता है, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने आंदोलन में मारे गये किसानों को शहीद का भी दर्जा देने की मांग की।
जाट-मुस्लिम एकता में पड़ेगी फूट
2013 में मुजफ्फरनगर के कवाल कांड के बाद मुजफ्फरनगर दंगा हुआ तो देशभर में इसका असर दिखा था। इसके बाद हुए ध्रुवीकरण का असर 2014 के लोकसभा चुनाव में दिखा था। लेकिन मुजफ्फरनगर के जीआईसी मैदान में 5 सितंबर 2021 को हुई किसान संयुक्त मोर्चा की महापंचायत में हर-हर महादेव और अल्लाहू अकबर की गूंज एक ही मंच से दोबारा सुनाई दी।
दावा किया गया कि जाट-मुस्लिम एक बार फिर एक साथ आए हैं। इसके बाद से ही सरकार बैकफुट पर आने लगी थी। लेकिन मोदी के मास्टर स्ट्रोक से एक बार फिर जाट-मुस्लिम एकता में दरार पड़ने की अटकलें लगाई जा रही हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु नानक जयंती के मौके पर राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का एलान क्या किया कि किसानों में खुशी की लहर दौड़ गई। कहीं पर किसानों ने मिठाइयां बांटी तो कई जगहों पर जलेबी बांटकर खुशियां मनाईं। कृषि कानूनों के खिलाफ किसान पिछले एक साल से ही आंदोलन कर रहे थे। अन्नदाताओं के आगे सरकार को आखिरकार झुकना पड़ा, लेकिन क्या पीएम मोदी की घोषणा करने भर से कृषि कानून निरस्त हो गए? तो ऐसा नहीं है।
कानून निरस्त करने की एक संवैधानिक प्रक्रिया होती है। इसके लिए संसद में सरकार को संवैधानिक प्रक्रिया को पूरी करनी होगी। संविधान और विधि विशेषज्ञों की मानें तो सरकार को तीनों विवादास्पद कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए संसद में विधेयक लाना होगा। आखिर क्या है वह प्रक्रिया? आइए विस्तार से समझते हैं…
क्या है प्रक्रिया?
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने कहा कि जो भी संशोधन होता है, उसे कानून मंत्रालय संबंधित मंत्रालय को भेजता है। इस मामले में कृषि मंत्रालय को प्रस्ताव भेजा जाएगा। इसके बाद उस संबंधित मंत्रालय के मंत्री संसद में बिल पेश करेंगे। तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने के लिए भी सरकार को संसद में बिल पेश करना होगा। सुभाष कश्यप बताते हैं कि संसद में बिल पेश होने के बाद उस पर बहस होगी और फिर वोटिंग।
कानून निरस्त करने की ये है प्रक्रिया
पूर्व केंद्रीय विधि सचिव पी के मल्होत्रा ने कहा, ‘किसी कानून को निरस्त करने के मामले में संसद की शक्ति संविधान के तहत कानून लागू किए जाने के ही समान है।’’पी के मल्होत्रा ने कहा, ‘‘जब कोई निरस्तीकरण विधेयक पारित किया जाता है, तो वह भी कानून होता है।’’ उन्होंने कहा कि तीनों कृषि कानून लागू नहीं किए गए थे, लेकिन वे संसद द्वारा पारित कानून हैं, जिन्हें राष्ट्रपति की अनुमति मिली है और उन्हें संसद द्वारा ही निरस्त किया जा सकता है।
पूर्व लोकसभा महासचिव पी डी टी आचार्य ने कहा कि सरकार तीनों कृषि कानूनों को एक निरस्तीकरण विधेयक के जरिए निरस्त कर सकती है। उन्होंने कहा कि विधेयक के उद्देश्य एवं कारण संबंधी वक्तव्य में सरकार यह कारण बता सकती है, वह तीनों कानूनों को निरस्त क्यों करना चाहती है।
ये हैं तीनों कृषि कानून
किसान उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) विधेयक, किसानों (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) का मूल्य आश्वासन अनुबंध एवं कृषि सेवाएं विधेयक और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक तीन कृषि कानून हैं, जिन्हें निरस्त करने की घोषणा की गई है।
सुप्रीम कोर्ट का आ चुका है फैसला
तीनों कृषि कानून का मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच चुका है। इस पर इसी साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कानूनों के अमल पर अगले आदेश तक रोक लगा दी थी। साथ ही एक कमेटी गठित की थी, लेकिन किसान कानून वापस लेने की मांग पर ही अड़े थे।
Report By : SHIVANGI SINGH / SIMRAN CHOUDHRY, NEWS DESK, NATION EXPRESS, लखनऊ
गुरु नानक जयंती की सुबह सूरज निकला तो हर कोई भक्तिभाव में सराबोर नजर आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस विशेष दिन को और खास बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने सालभर से चली आ रही किसानों की नाराजगी को दूर करने की कोशिश की और अन्नदाताओं को हुई दिक्कतों पर क्षमा मांगते हुए तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का एलान कर दिया। किसान संगठनों ने इस फैसले का स्वागत तो किया, लेकिन किसान नेता राकेश टिकैत ने अलग ही राग अलापा। उन्होंने पहले तो संसद में कृषि कानूनों के वापस होने तक आंदोलन खत्म नहीं करने की बात कही। इसके बाद एमएसपी समेत किसानों की अन्य मांगों का मसला भी उठा दिया। अब सवाल यह उठता है कि पीएम मोदी के एलान के बाद भी क्या किसान आंदोलन खत्म नहीं होगा? क्या यह पीएम मोदी का मास्टरस्ट्रोक साबित होगा? क्या पीएम के एलान और किसानों के भरोसे के बीच अब सियासी दांव-पेच चले जाएंगे?
केंद्र सरकार द्वारा किसान आंदोलन एवं कई किसानों के शहीद होने के उपरांत मोदी सरकार की नींद खुली और आज खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी इनके जन्मदिन पर आंदोलन के सामने आखिरकार नतमस्तक होते हुए तीन कृषि काला कानून वापस लिया! प्रदेश राजद के पूर्व प्रदेश महासचिव स प्रवक्ता मनोज कुमार पांडेय ने कृषि कानून वापसी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि केंद्र सरकार की हठधर्मिता के चलते देश के कई किसान आंदोलन में शहीद हो गए ,करोड़ों का कृषि से संबंधित व्यापार नुकसान हुआ ,आंदोलन में किसानों द्वारा की उपजाऊव फसलों का भी नुकसान हुआ ,तब जाकर केंद्र सरकार की आंख खुली और यह तीन कृषि काला कानून वापस लिया जोकि किसानों के आंदोलन की जीत है!
लोहरदगा: भाजपा किसान मोर्चा लोहरदगा जिला अध्यक्ष जितेंद्र महतो ने एक प्रेस बयान जारी कर भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कृषि कानून वापस लिए जाने को सराहनीय एवं स्वागत योग्य कदम बताया। भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा जिला अध्यक्ष श्री महतो ने कहा कि प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री श्री मोदी जी द्वारा किसानों के हित में तीनों बेहतरीन कानून बनाए, मगर कुछ विपक्षी स्वार्थी नेताओं द्वारा किसानों को गोलबंद कर इसका पुरजोर विरोध किया गया। जिसके चलते देश में अराजकता का माहौल बनाया गया। सड़कों पर उत्पात मचाते हुए महीनों तक रास्ता जाम किया गया। विपक्षियों द्वारा इस मुद्दे को उछाल कर सरकार की छवि को किसान विरोधी बनाने का प्रयास किया जा रहा था। उन्होंने कहा कि केंद्र में किसानों द्वारा ही चुनी गयी फुल बहुमत की सरकार है। हालांकि तीनों कृषि कानून किसानों के हितों के मद्देनजर बनायी गयी है। बहरहाल अच्छा हो या बुरा, उनके अनुरूप ही कार्य होनी चाहिए, जिससे पूरे देश के किसान खुश रहे।
झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष और राज्य के वित्त तथा खाद्य आपूर्ति मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव ने तीन नये कृषि कानून को निरस्त किये जाने की घोषणा का स्वागत करते हुए कहा यह किसानों की बड़ी जीत है। अभिमानी केन्द्र सरकार को अन्नदाताओं के सामने झुकना पड़ा।डेमोक्रेसी में कोई कानून जबरन थोपा नहीं जाता है। कानून बनाने के पहले लोगों से विचार-विमर्श और उनका सुझाव लिया जाता है जिनके लिए कानून बन रहा है। उनसे पूछा जाता है कि यह उनके हित में है या नहीं, लेकिन बीजेपी ने एकतरफा फैसला ले लिया और तीन नये कृषि कानून को संसद से पारित कराने का काम किया। इस मौके पर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के डेलिगेट्स आलोक कुमार दूबे ने कहा कि एक वर्ष तक कृषि कानून के खिलाफ चल रहे आंदोलन में पार्टी उनके साथ खड़ी रही। भाजपा नेताओं और केंद्र सरकार ने मंत्रियों ने किसान आंदोलन को कभी खालिस्तान समर्थक, तो कभी आतंकियों का आंदोलन बताते की कोशिश, परंतु लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन जारी रहा। इस आंदोलन में आज एक बड़ी सफलता मिली है, लेकिन जब तक लोकसभा से इसे संवैधानिक तरीके से वापस नहीं ले ले लिया जाता है, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने आंदोलन में मारे गये किसानों को शहीद का भी दर्जा देने की मांग की।