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जमीनी हकीकत : सरजमीं पहुंचते ही आंखों से छलक गया आंसू : माइनस 20 डिग्री में आसमान के नीचे सोना पड़ा, इंडियन एम्बेसी से कोई नहीं आया, सिर्फ प्रचार में जुटी रही सरकार

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NEWS DESK, NATION EXPRESS, NEW DELHI

यूक्रेन के सूमी में फंसी भारतीय छात्रा इशिका सरकार ने NATION EXPRESS के साथ EXCLUSIVE बातचीत में हैरान करने वाले खुलासे किए हैं. उनका कहना है कि भारतीयों की हालात काफी बदतर है.

रोमानिया की इंडियन एम्बेसी सो रही थी क्या?

 

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“24 फरवरी को यूक्रेन-रूस के बीच वॉर शुरू हो चुका था, हम सब डर गए कि अब क्या होगा। हम 2 दिन तक इंडियन एम्बेसी को कॉल करते रहे। किसी ने फोन नहीं उठाया। अपना सारा सामान लादकर 15 किलोमीटर पैदल चले। चार–चार रातें खुले आसमान के नीचे माइनस 10 और माइनस 20 डिग्री में हमने काटीं। हम कुचले गए। हमें पीटा गया। अब सरकार इवेक्युएशन के नाम पर अपना प्रचार कर रही है। क्रेडिट ले रही है। शर्म भी नहीं आती इन्हें। हमारे बाकी साथियों को यूक्रेन से निकालिए, हम खुद आपकी जय जयकार करेंगे।”

नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के बाहर खड़ीं दिव्यांशी सचान हमें ये बताते-बताते फफक पड़ीं। यूक्रेन से आए और भी स्टूडेंट्स ने NATION EXPRESS से अपनी आपबीती शेयर की। 

ये इवैक्यूएशन नहीं है, सिर्फ प्रचार है

फर्स्ट ईयर स्टूडेंट दिव्यांशी को रोमानिया बॉर्डर पर तीसरे दिन भीड़भाड़ में लोगों ने कुचल दिया। वह बोलीं, ‘लोग मेरे सिर, कंधों को रौंदते हुए आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे। जब हम रोमानिया बॉर्डर क्रॉस कर चुके थे, तब हमें इंडियन एम्बेसी के लोग मिले।’ ये बोलते हुए उनकी आंखों से आंसू आ गए, गला भर आया।

उन्होंने कहा कि ‘अगर भारत सरकार कह रही है कि ये उन्होंने हमारा इवैक्यूएशन कराया है, तो ये सरासर झूठ है। पोलैंड से भारत फ्री फ्लाइट को इवैक्यूएशन नहीं बोलते हैं। अगर भारत सरकार यूक्रेन से निकलने में हमारी मदद करती तो, उसे इवैक्यूएशन कहा जाता। देश के लोगों को ये सच बताया जाना चाहिए।’

जब हम मदद की गुहार लगा रहे थे, सरकार पीआर में जुटी थी

बिहार के सहरसा की रहने वाली प्रतिभा विनिस्तिया मेडिकल यूनिवर्सिटी की फोर्थ ईयर की स्टूडेंट हैं। वो बताती हैं कि ‘हमने इंडियन एम्बेसी के अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन एम्बेसी के किसी अधिकारी ने कॉल या मैसेज का जवाब नहीं दिया। हमारी एक दोस्त ने जब असलियत दिखाने के लिए फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट किया, तो तुरंत एम्बेसी से फोन आ गया कि वीडियो तुरंत डिलीट करो।’

प्रतिभा को बेहद अफसोस है कि सरकार स्टूडेंट्स को यूक्रेन से निकालने की बजाय अपने प्रचार में ज्यादा बिजी है।

स्टूडेंट्स ने 6-6 हजार रुपए देकर खुद ही बस बुक की, एम्बेसी कहां थी?

प्रतिभा बताती हैं, ‘वॉर शुरू होने के बाद 2 दिन तक तो हमने इंतजार किया, लेकिन इसके बाद हमने खुद पहल की। 26 फरवरी की रात को हमने मिलकर एक बस बुक की। हमसे प्रति छात्र 6 हजार रुपए लिए गए, हमें लगता है कि इसमें एजेंट्स और एम्बेसी वाले दोनों मिले हुए थे।

बस से 14 घंटे का सफर तय करके हम रोमानिया बॉर्डर तक पहुंचे। बस से उतरने के बाद हमें माइनस 20 डिग्री की ठंड में 15 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। हम अपने कंधे पर पीने का पानी, खाना और अपना सामान लादे हुए थे।’

रोमानिया की इंडियन एम्बेसी सो रही थी क्या?

विनिस्तिया मेडिकल यूनिवर्सिटी की थर्ड ईयर स्टूडेंट शताक्षी कहती हैं, ‘हमें लगा रोमानिया बॉर्डर पर इंडियन एम्बेसी के लोग हमें निकाल लेंगे, लेकिन वहां भी कोई नहीं था। 4000 स्टूडेंट भारी बर्फबारी के बीच 4 दिन तक रोमानिया बॉर्डर पर खड़े रहे, हमारी सुनने वाला कोई नहीं था।

कई अफ्रीकी देशों के नागरिकों को उनके एम्बेसी वाले आसानी से बॉर्डर पार करा रहे थे, लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय से वहां कोई नहीं था। भारतीय छात्रों से मार-पिटाई की गई, लड़कियों से बदसलूकी की गई। भगदड़ में जूनियर स्टूडेंट्स दब गईं। दूसरे देश के लोगों के सामने हम भारतीयों को शर्म आ रही थी कि हमारे देश के अधिकारी कुछ नहीं कर रहे।

यूक्रेन से दिल्ली लौटे मेडिकल स्टूडेंट्स में वहां फंसे अपने साथियों की फिक्र है।

रोमानिया ने मदद की, क्रेडिट सरकार के लोग ले रहे

प्रतिभा बताती हैं, ‘रोमानिया के लोगों ने हमारी अच्छी मदद की, रुकने की जगह दी और भर पेट खाना खिलाया। रोमानिया में हमें इंडियन एम्बेसी के लोग मिले और उन्होंने हमसे बहुत ही बेहूदा व्यवहार किया। उन्होंने कहा- जो बाथरूम साफ करेगा, हम उसे पहले भारत ले जाएंगे और बाकी लोगों को बाद में’।

हर स्टूडेंट इतना थका हुआ था कि किसी की हिम्मत नहीं थी कि 4 दिन बर्फ में खड़े रहने के बाद बाथरूम साफ करे, वो भी इस लालच में कि उसे पहले इंडिया ले जाया जाएगा, लेकिन घर जाने की इतनी बेसब्री थी कि कुछ स्टूडेंट टॉयलेट साफ करने चले गए। इंडियन एम्बेसी वाले देखते ही रहे, कुछ किया नहीं।’

शताक्षी कहती हैं, ‘जब हम खुद रोमानिया बॉर्डर क्रॉस कर सकते हैं, तो खुद अपना टिकट कराकर वापस भी आ सकते थे। सारा संघर्ष हमने किया और आखिरी वक्त पर सरकार के लोग क्रेडिट ले रहे हैं।’

Report By :-ANUJA AWASTHI, NEWS DESK, NATION EXPRESS, NEW DELHI

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