SUNDAY SPECIAL : कभी हरियाली और पहाड़ों से घिरी रहने वाली रांची अब हीटआइलैंड में हो गई है तब्दील : अभी नही सुधरे तो आने वाली पीढ़ी को भुगतने होंगे गंभीर परिणाम
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कभी हरियाली से भरी रहने वाली रांची में अब ऊंचे-ऊंचे भवन ही दिखाई पड़ते हैं
हाल के वर्षों में रांची में काफी बदलाव आया है। यहां भी कंक्रीट का जंगल तेजी से फैलता जा रहा है। बहुमंजिली इमारतों का जाल दिनोदिन फैल रहा है। शॉपिंग मॉल्स और मल्टीप्लेक्स बन रहे हैं। इस शहरीकरण का सबसे ज्यादा असर यहां के मौसम पर पडऩे लगा है। कभी हरियाली और पहाड़ों से घिरी रहने वाली रांची अब हीट आइलैंड में तब्दील होती जा रही है। लेकिन, इसकी चिंता न सरकार को है और न ही आम लोगों को। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में अगर इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ी रांची के सुहाने मौसम के बारे में सिर्फ किताबों में ही पढ़ सकेगी।
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झारखंड अलग राज्य गठन के बाद से राजधानी में कंक्रीट का जाल जबरदस्त तरीके से फैल गया है। जिसके कारण कभी बिहार की ग्रीष्म राजधानी रहने वाली रांची का मौसम भी अब पूरी तरह से बदल गया है। गर्मी के दिनों में भी लोगों को बारिश का मजा देने वाला यह शहर अब हीट आइलैंड में बदल चुका है। कभी पेड़, पहाड़ और तालाब के कारण वाष्पीकरण की प्रक्रिया तेजी से होती थी और 37 डिग्री से ऊपर पारा चढ़ते ही दोपहर के बाद बारिश होने लगती थी। लेकिन कंक्रीट का जाल बिछने की वजह से हवा धरती के संपर्क में आते ही गर्म होकर ऊपर उठती है। वाष्पीकरण की वजह से जो बादल बनते भी हैं, तो उसे शहर से धकेल कर दूर ले जाती है। यही वजह है कि जेठ दूर रहने के बावजूद चैत्र में सूरज की किरणें झुलसाने लगी हैं

मई की गर्मी अप्रैल में दिखने लगी
रांची में 70 के दशक में भी गर्मी पड़ती थी। उस जमाने में मई का महीना सबसे गर्म होता था। शहर का तापमान 37 डिग्री तक पहुंच जाता था। लेकिन जैसे ही धूप अपनी तपिश दिखाता, दोपहर के बाद बारिश होने लगती थी। जिसके कारण लोगों को रात के वक्त सालों भर ठंड का एहसास होता था। वहीं, बीते कुछ सालों तक अप्रैल महीने में औसत तापमान 36 डिग्री रहता था। लेकिन बीते चार साल से 42 डिग्री तक तापमान पहुंच जा रहा है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार झारखंड बनने के बाद से ही रांची का तेजी से शहरीकरण होने के कारण ही यहां के मौसम में बदलाव आई है।

अपार्टमेंट के बीच हो ग्रीन पार्क
दिनोदिन बढ़ती आबादी के कारण शहर की हरियाली पूरी तरह से खत्म होने के कगार पर है। रोजाना सैकड़ों पेड़ों को काटकर ऊंची-ऊंची इमारतें बनाई जा रही हैं। लेकिन पेड़ लगाने की कोई पहल नहीं हो रही है। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड के साइंटिस्ट गौतम कुमार राय कहते हैं कि बढ़ती आबादी के कारण अपार्टमेंट बनने पर रोक लगाना मुश्किल है। लेकिन दो अपार्टमेंट के बीच कम से कम 100 मीटर का फासला और उनके बीच ग्रीन पार्क या ग्रीन जोन रखने का नियम लागू हो, तो रांची हीट आइलैंड के इफेक्ट से बच सकती है।

पहाड़ों को बचाना होगा
रांची के मौसम के सुहाने-पन को बनाए रखने में पहाड़ों को बचाना जरूरी है, क्योंकि मौसम को मेंटेन करने उनका रोल इम्पॉर्टेंट है। पहाड़ बादलों को रोककर उनसे बारिश कराते हैं। यही वजह है कि पहले रांची में बारिश की समस्या नहीं होती थी। लेकिन अब इन पर भी संकट बने हुए हैं। दर्जनों पहाड़ पूरी तरह से गायब हो चुके हैं। इन्हें बचाने के लिए इनिशिएटिव जरूरी है। इसके साथ हरियाली विहीन हो चुके पहाड़ों के आसपास के एरिया को हरा-भरा बनाना होगा। इससे ग्राउंड वाटर रिचार्ज भी ढंग से हो पाएगा।

क्यों गंभीर है स्थिति
– वन क्षेत्र लगातार हो रहे हैं खत्म
– पहाड़ों की ऊंचाई धीरे-धीरे कम हो रही है
– वाहनों की लगातार बढ़ती संख्या और जाम की स्थिति
– सड़क लगे पेड़ों का खत्म होना
क्या है उपाय
– पहाड़ों को अतिक्रमण मुक्त कर उसकी हरियाली लौटानी होगा
– नदी और तालाब को बचाने के साथ इसके आसपास पेड़ लगाने होंगे
– रांची के वन क्षेत्र के घटते प्रतिशत को बढ़ाना होगा
– अपार्टमेंट और सड़क के किनारे पेड़ अनिवार्य रूप से लगाने होंगे
भुगतेंगी आने वाली पीढ़ी
शहर की हरियाली खत्म होने के कारण गर्मी के दिनों में बारिश होना सपना बनकर रह गई है। जंगल, पहाड़ और नदी को बचाकर फिर से पुरानी राजधानी का मौसम लौट सकता है। इसका बेहतर उदाहरण है रांची जिले का मैक्सलुस्किगंज, जहां अभी भी गर्मी के दिनों रात में ठंड का एहसास होता है। नीतीश प्रियदर्शी, पर्यावरणविद्
नोट: न्यू. तापमान बढ़ता जा रहा है।
माह वर्ष तापमान अप्रैल 2010 15.8 ((न्यूनतम))
अप्रैल 2011 16.8 ((न्यूनतम))
अप्रैल 2012 16.4 ((न्यूनतम))
अप्रैल 2013 16.6 ((न्यूनतम))
अप्रैल 2014 23.7 ((न्यूनतम)

आते थे पर्यटक : गर्मी शुरू होते ही आसपास के राज्य से भी काफी संख्या में पर्यटक आते थे। हरियाली खत्म होने से अब यहां का सुहाना मौसम याद बनक रह गया है। आरसी सिंह, निवासी, रांची
बारिश होती थी : रांची में 34 डिग्री से ऊपर पारा चढ़ते ही दोपहर के बाद बारिश होने लगती थी। जिसके कारण यहां सालों भर ठंड का एहसास होता रहता था। बीके तिवारी, निवासी, रांची
रांची के मौसम के सुहाने-पन को बनाए रखने में पहाड़ों को बचाना जरूरी है, क्योंकि मौसम को मेंटेन करने उनका रोल इम्पॉर्टेंट है। पहाड़ बादलों को रोककर उनसे बारिश कराते हैं। यही वजह है कि पहले रांची में बारिश की समस्या नहीं होती थी। लेकिन अब दर्जनों पहाड़ पूरी तरह से गायब हो चुके हैं। इन्हें बचाने के लिए इनिशिएटिव जरूरी है। इसके साथ हरियाली विहीन हो चुके पहाड़ों के आसपास के एरिया को हरा-भरा बनाना होगा। इससे ग्राउंड वाटर रिचार्ज भी ढंग से हो पाएगा।
पहाड़ों को बचाना होगा
जंगल, पहाड़ और नदी को बचाकर फिर से पुरानी राजधानी का मौसम लौट सकता है। इसका बेहतर उदाहरण है रांची जिले का मैक्सलुस्किगंज, जहां अभी भी गर्मी के दिनों रात में ठंड का एहसास होता है :- नीतीश प्रियदर्शी, पर्यावरणविद्
> पहाड़ों को अतिक्रमण मुक्त कर उसकी हरियाली लौटानी होगा
> नदी और तालाब के आसपास परती भूमि पर पेड़ लगाने होंगे
> रांची के वन क्षेत्र के घटते प्रतिशत को बढ़ाना होगा
> अपार्टमेंट व सड़कों के किनारे पेड़ अनिवार्य रूप से लगाएं
> वन क्षेत्र लगातार हो रहे हैं खत्म
> पहाड़ों की ऊंचाई धीरे-धीरे कम हो रही है
> वाहनों की लगातार बढ़ती संख्या और जाम की स्थिति
> सड़क लगे पेड़ों का खत्म होना
> एसी-फ्रिज आदि से निकलने वाले गैस से ओजोन को खतरा

अप्रैल में दिखने लगी जून की गर्मी
रांची में 70 के दशक में मई का महीना सबसे गर्म होता था। शहर का तापमान 37 डिग्री तक पहुंचते ही दोपहर के बाद बारिश होने लगती थी। जिसके कारण लोगों को रात में सालों भर ठंड का एहसास होता था। वहीं, बीते कुछ सालों में अप्रैल महीने में अधिकतम और न्यूनतम तापमान दोनों में जबरदस्त इजाफा हुआ है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार झारखंड बनने के बाद से ही रांची का तेजी से शहरीकरण होने के कारण ही यहां के मौसम में बदलाव आई है।
Report By :- SWATI PATEL, SPECIAL DESK, NATION EXPRESS, RANCHI