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इबादत-ए-इलाही के रंग और कुरान की तिलावत में गुजरा पहला रोजा ! 7 साल की इनाया ने रखा पहला रोज़ा

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रमजान माह का आगाज हो गया है। रविवार को मुस्लिम समुदाय ने पूरी अकीदत के साथ पहला रोजा रखा। आम दिनों के मुकाबले दो गुना नमाजी मस्जिदों में इबादत के लिए पहुंचे थे। शाम को रोजेदारों ने इफ्तार कर पहला रोजा मुकम्मल किया। यह सिलसिला 29 या 30 दिनों तक चलेगा। एक ओर जहां बाजारों में चहल पहल बढ़ी तो वहीं घरों और मस्जिदों में लोग इबादत करते हुए नजर आए।

इबादत और तिलावत के बीच गुजरा पहला रोजा -

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इस महीने का खास महत्व है। इसके महत्व को लेकर मस्जिदों में तकरीरें भी हुईं। वहीं मस्जिदों में नमाज-ए-फजर, जुहर, असर, मगरिब और एशा के बाद हजारों हाथ अमन और शांति के लिए उठे। हर नमाज के बाद खुदा से गुनाहों की माफी और सही रास्ते पर चलने के लिए दुआ मांगी गई। उलेमा ने लोगों को हिदायत देते हुए कहा बाजारों में वक्त गुजारने की बजाय इबादत में समय लगाएं।

रमजान शुरु: जानें क्या है इबादत, रोजा और सदका का पवित्र महीना

सदका, जकात से जरूरतमंदों की मदद, तालीम को बढ़ावा

रमजान का मुकद्दस महीना शुरू हो चुका है। पवित्र माह में इस बार रोजा और इबादत के साथ सोशल मैनेजमेंट को बढ़ाने की तैयारी है। उलेमा और सामाजिक संगठनों ने सदका और जकात (दान) की राशि जरूरतमंदों की मदद के साथ तालीम (शिक्षा) को बढ़ाने में इस्तेमाल करने का फैसला लिया है। जकात इस्लाम के 5 स्तंभ में से एक है।

इस राशि का उपयोग समाज की भलाई खासतौर से तालीम के लिए करने पर जोर दिया गया। इस पहल से राशि को ऐसे सोशल सेक्टर में उपयोग किया जाएगा जो सीधे लोगों से जुड़े हैं। मदीना मस्जिद के इमाम मुफ्ती अब्दुल मलिक मिस्बाही ने कहा जकात जरूरतमंदों की मदद का एक जरिया है। एक ऐसा संपन्न व्यक्ति, जो मानसिक रूप से स्वस्थ है और जिस पर कोई कर्ज नहीं है, वह जकात दे। उसे अपनी संपत्ति का कुल ढाई प्रतिशत सालाना जकात के रूप में गरीब, जरूरतमंद, आर्थिक रूप से कमजोर बेसहारा व्यक्ति को ये राशि अदा करनी होती है। जरूरतमंदों तक इस राशि को पहुंचाने के उद्देश्य से कई लोग इसे संगठनों में जमा कराते हैं।

माह ए रमजान में होते हैं तीन अशरे, हर अशरे का है अलग महत्व -

इस बार चार जुमे, जुमातुलविदा 28 मार्च को

इस बार माह-ए-रमजान में चार जुमे होंगे। पहला जुमा 07 मार्च मार्च, दूसरा 14 मार्च, तीसरा 21 मार्च और जुमातुलविदा की नमाज 28 मार्च को अदा की जाएगी। माह रमजान के 30 रोजे पूरे होने के बाद 29 मार्च चांद दिखने के अनुसार ईद उल फितर का त्योहार मनाया जाएगा। इस बार 30 या 31 मार्च को ईद हो सकती है।

3 से 27 दिन में मुकम्मल होगा कुरान

शहर की मस्जिदों में तरावीह हो रही है। कई प्रमुख मस्जिदों में 21 से 27 दिन में कुरान पूरा होगा। कई जगह यह 10 दिन तो कहीं 15 दिन में पूरा किया जा रहा है। कुछ जगह यह तीन दिन में पूरा किया जा रहा है। तरावीह में इमाम कुरान का पाठ करते हैं।

अल्लाह की इबादत में मशगूल रही इनाया

अल्लाह से प्यार व इबादत की कोई उम्र नहीं होती। बड़ों के साथ-साथ छोटे भी अल्लाह की इबादत में मशगूल रहे। छोटे बच्चों ने रमजान के पाक महीने में पहला रोजा रखकर इबादत की। नन्हें रोजेदारों ने भी नमाज पढ़ी और अल्लाह पाक से दुआ मांगी। रांची के मिशन ग्राउंड आजाद बस्ती के रहने वाले मोहम्मद शाहनवाज और नैंसी की पुत्री इनाया अख्तर ने रमजान का पहला रोजा रखा। 7 साल की इनाया को अलसुबह माता नैंसी और पिता मोहम्मद शाहनवाज ने बेहतरीन सेहरी खिलाई। 7 साल की इनाया ने फजर की नमाज पढ़ी। सारा दिन इबादत में गुजारा। घर के लोगों ने हौसला अफजाई की इनाया को जब दस्तरख्वान पर तमाम तरह की गिजा (व्यंजन) देखा तो अल्लाह का शुक्रिया अदा किया। ढेर सारे तोहफों व दुआ के साथ इनाया ने अपना रोजा मुकम्मल किया।

माह ए रमजान में होते हैं तीन अशरे, हर अशरे का है अलग महत्व

Pin page1. रमजान का पहला अशरा रमजान महीने के पहले 10 दिन रहमत के होते हैं। रोजा नमाज करने वालों पर अल्लाह की रहमत होती है। रमजान के पहले अशरे में मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा दान कर के गरीबों की मदद करनी चाहिए। हर एक इंसान से प्यार और नम्रता का व्यवहार करना चाहिए।

 

2. रमजान का दूसरा अशरा रमजान के 11वें रोजे से 20वें रोजे तक दूसरा अशरा चलता है। यह अशरा माफी का होता है। इस अशरे में लोग इबादत कर के अपने गुनाहों से माफी पा सकते हैं। इस्लामिक मान्यता के मुताबिक, अगर कोई इंसान रमजान के दूसरे अशरे में अपने गुनाहों (पापों) से माफी मांगता है, तो दूसरे दिनों के मुकाबले इस समय अल्लाह अपने बंदों को जल्दी माफ करता है।

3. रमजान का तीसरा अशरा रमजान का तीसरा और आखिरी अशरा 21वें रोजे से शुरू होकर चांद के हिसाब से 29वें या 30वें रोजे तक चलता है। ये अशरा सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। तीसरे अशरे का उद्देश्य जहन्नुम की आग से खुद को सुरक्षित रखना है। इस दौरान हर मुसलमान को जहन्नम से बचने के लिए अल्लाह से दुआ करनी चाहिए। रमजान के आखिरी अशरे में कई मुस्लिम मर्द और औरतें एहतफाक में बैठते हैं। बता दें, एहतकाफ में मुस्लिम पुरुष मस्जिद के कोने में 10 दिनों तक एक जगह बैठकर अल्लाह की इबादत करते हैं, जबकि महिलाएं घर में रहकर ही इबादत करती हैं।

 

Report By :- AAKANSHA TIWARI / HEENA KHAN, CITY DESK, NATION EXPRERSS, RANCHI 

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